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EXCLUSIVE: बंगाल में BJP सरकार आने के बाद क्या अब पूरी तरह रुक पाएगी बांग्लादेशी घुसपैठ? BSF के पूर्व DIG NND दुबे ने बताई अंदर की बात

 Written By: Vinay Trivedi
 Published : May 16, 2026 08:33 am IST,  Updated : May 16, 2026 08:46 am IST

क्या बंगाल में सरकार बदलने के बाद बांग्लादेशियों की तरफ से भारतीय सीमा में होने वाली घुसपैठ पर अब पूरी तरह लगाम लग जाएगी? भारत-बांग्लादेश बॉर्डर की जमीनी हकीकत और BSF की चुनौतियों पर पढ़िए BSF के पूर्व DIG नरेंद्र नाथ धर दुबे से एक्सक्लूसिव बातचीत।

Bangladesh infiltration issue- India TV Hindi
बांग्लादेशियों की घुसपैठ और सीमा पर चुनौतियों को लेकर BSF के पूर्व DIG NND दुबे से बातचीत पढ़िए। Image Source : INDIA TV

बांग्लादेश से घुसपैठ का मुद्दा लंबे वक्त से भारत के लिए चुनौती बना हुआ है। पश्चिम बंगाल में नई सरकार आने के बाद, जमीन पर बड़े बदलाव होने की उम्मीद है। बांग्लादेश सीमा को पूरी तरह से सील करने के लिए, BSF को वह 600 एकड़ जमीन मिलने वाली है जो अभी तक सियासी अड़चनों में फंसी हुई थी। लेकिन ऐसे में प्रश्न है कि क्या सीमा पर बाड़ेबंदी करने से घुसपैठ का पूरा नेटवर्क ध्वस्त हो जाएगा? स्मार्ट बॉर्डर मैनेजमेंट की इसमें क्या जरूरत है? और पहले से ही जो लोग भारत में घुसपैठ कर चुके हैं, उन्हें ट्रेस करने के लिए हमारा इंटेलिजेंस सिस्टम कैसे काम करता है? इन सुलगते हुए सवालों का जवाब जानने के लिए INDIA TV ने BSF के पूर्व डीआईजी नरेंद्र नाथ धर दुबे से एक्सक्लूसिव बातचीत की।

सवाल: भारत-बांग्लादेश बॉर्डर की जियोग्राफी काफी कठिन है। पूर्व डीआईजी के तौर पर ग्राउंड जीरो का आपका एक्सपीरियंस क्या कहता है- अगर बॉर्डर पर पूरी तरह से Fencing होगी तो उसमें सबसे बड़ी भौगोलिक और व्यावहारिक चुनौतियां क्या आएंगी?

जवाब: नरेंद्र नाथ धर दुबे ने कहा कि भौगोलिक रूप से सबसे बड़ी बात यह है कि इस बॉर्डर की लंबाई 4,100 किलोमीटर से भी अधिक है। यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा जमीनी बॉर्डर है। आम लोगों को शायद लगता हो कि पाकिस्तान का बॉर्डर बड़ा है, लेकिन बांग्लादेश का बॉर्डर उससे भी 900 किलोमीटर लंबा है और यह पूरी तरह से लैंड बॉर्डर है।

मुख्य चुनौतियां-

  • नदी-नाले (रिवराइन एरिया): इस बॉर्डर का लगभग एक-चौथाई हिस्सा करीब 900 किलोमीटर रिवराइन है। हिमालय से निकलने वाली कई नदियां मैदानी इलाकों से होते हुए बंगाल की खाड़ी में मिलती हैं।
  • बाड़ लगाने में कठिनाई (नॉन-फिजिबल गैप्स): इतने लंबे बॉर्डर पर हर जगह फेंसिंग या ह्यूमन बैरियर नहीं है। कुछ इलाकों में बाड़ लगाना बेहद मुश्किल है। उदाहरण के लिए, मानसून के दौरान ब्रह्मपुत्र नदी की चौड़ाई 62 किलोमीटर से ज्यादा हो जाती है। ऐसे तेज बहाव वाले इलाके में फेंसिंग करना बहुत मुश्किल है।
  • नदियों का रास्ता बदलना: नदियां अपना रास्ता बदलती रहती हैं और नदी के बीच के छोटे द्वीप बनाती हैं, जो एक अलग समस्या है।
  • समान भूगोल और आबादी: सीमा के दोनों ओर का भूगोल लगभग एक जैसा है। साथ ही, दोनों तरफ की आबादी, भाषा, पहनावा, संस्कृति और त्योहारों में बहुत समानता है। एक ही परिवार, जाति या समुदाय के लोग दोनों देशों में बंटे हुए हैं।

इस घनी आबादी और समानताओं के बीच घुसपैठ को रोकना किसी भी सुरक्षा बल के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है।

सवाल: दलदली या पानी वाले इलाकों में जहां फेंसिंग नहीं हो सकती, वहां घुसपैठ रोकने के और क्या तरीके हो सकते हैं? बीएसएफ को किन चीजों पर फोकस करना चाहिए और 'स्मार्ट बॉर्डर मैनेजमेंट' क्या है?

जवाब: BSF के पूर्व डीआईजी नरेंद्र नाथ धर दुबे ने कहा कि बॉर्डर पर दो तरह के गैप्स हैं- एक 'फिजिबल'- जहां बाड़ लगाना संभव है और दूसरे 'नॉन-फिजिबल'- जहां संभव नहीं है। जहां बाड़ लगाना मुमकिन है, वहां कूटनीतिक और राजनीतिक चुनौतियां रही हैं। बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार के समय संबंध अलग थे। तख्तापलट के बाद मोहम्मद यूनुस की सरकार आई, तो रिश्ते थोड़े असहज हुए क्योंकि वहां असामाजिक तत्वों का दबदबा बढ़ गया। हालांकि, अब स्थिति बदल रही है और दोनों देशों के बीच संबंधों को लेकर रिसेटिंग मोड पर काम हो रहा है। भारत का भी प्रयास है कि इतने बड़े पड़ोसी के साथ कूटनीतिक संबंध बेहतर रखे जाएं।

हमें नॉन-फिजिबल गैप्स के लिए तकनीक पर निर्भर होना पड़ेगा, क्योंकि हम इस पूर्वी सीमा को यूं ही खुला नहीं छोड़ सकते। अतीत में जंगल और नदियों के रास्ते ही आतंकी भारत में घुसे हैं। संदेशखाली और मुर्शिदाबाद के दंगों में एबीटी (ABT) और हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी (HuJI) के स्लीपर सेल एक्टिव थे। जमात-उल-मुजाहिदीन और आईएसआई (ISI) का भी इस क्षेत्र में प्रभाव बढ़ा है।

'स्मार्ट फेंसिंग' इसलिए जरूरी है क्योंकि असामाजिक तत्व आम फेंसिंग को काट देते हैं या वह बाढ़ में बह जाती है। बीएसएफ ने धुबरी इलाके में 'कंपोजिट इंटीग्रेटेड बॉर्डर मैनेजमेंट सिस्टम' (CIBMS) के तहत एक पायलट प्रोजेक्ट भी शुरू किया है। इसके अलावा, भारत 'लैंड एंड पोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया' (LPAI) के जरिए भारत-बांग्लादेश सीमा पर मौजूद 8 इंटरनेशनल चेक पोस्ट (ICPs) को अपग्रेड कर रहा है। इन चेक पोस्ट्स से सालाना 26 लाख लोगों की आवाजाही और 7 लाख ट्रकों का व्यापार होता है। इसे दुरुस्त करने से भी स्थिति बेहतर होगी।

सवाल: बाड़ेबंदी या जमीन अधिग्रहण में पिछली बंगाल सरकार के समय किस तरह की प्रशासनिक या राजनीतिक अड़चनें सामने आती थीं और अब नई सरकार से क्या उम्मीदें हैं?

जवाब: नरेंद्र नाथ धर दुबे ने कहा कि ऐतिहासिक तौर पर, सीमा सुरक्षा बलों के गठन से पहले राज्यों की पुलिस ही सीमा की रक्षा करती थी। 1965 के बाद बीएसएफ को पाकिस्तान और बांग्लादेश यानी तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान की सीमाओं की जिम्मेदारी मिली।

सीमा सुरक्षा देशहित का मुद्दा है, जिसे केंद्र और राज्य की राजनीति से अलग रखना चाहिए। लेकिन पश्चिम बंगाल में ऐसा नहीं हुआ। बीएसएफ जैसी फोर्स, जो 1965 में बनी थी, उसे अपनी सीमा चौकियां (BOPs) स्थापित करने के लिए 6 दशकों तक अपनी ही जमीन नहीं मिल पाई। इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बहुत खराब स्थिति ही कहा जाएगा।

जमीन अलॉट न होने और फेंसिंग रुकने से सीधा फायदा घुसपैठियों को मिलता है। आपको याद होगा कि 1993 में जैश-ए-मोहम्मद का चीफ मौलाना मसूद अजहर भी मालदा के रास्ते ही भारत में घुसा था। फेक करेंसी का भी एक बड़ा नेटवर्क इसी बॉर्डर से चलता था।

आज स्थिति यह है कि बांग्लादेशी घुसपैठिए भारत के तमाम शहरों- दिल्ली, यूपी, महाराष्ट्र से लेकर तमिलनाडु तक फैल चुके हैं। वे यहां आधार, पैन कार्ड बनवा लेते हैं, बैंक खाते खोल लेते हैं और सरकारी योजनाओं का लाभ उठाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक ऐसे लाखों घुसपैठिए भारत में हैं। 141 करोड़ की आबादी वाले देश के लिए यह अर्थव्यवस्था और सुरक्षा दोनों पर भारी दबाव है। जब ये डिजिटल दस्तावेजों का हिस्सा बन जाते हैं, तो इन्हें ढूंढकर अलग करना बहुत बड़ी चुनौती बन जाता है।

सवाल: अगर बीएसएफ को 60 साल से अटकी हुई वह जमीन अब मिल जाती है, तो बाड़ेबंदी में कितना समय लगेगा? इसके बाद बीएसएफ की ऑपरेशनल क्षमता कितनी बढ़ जाएगी?

जवाब: BSF के पूर्व डीआईजी नरेंद्र नाथ धर दुबे ने कहा कि बाड़ेबंदी होने से निश्चित रूप से ऑपरेशनल क्षमता बढ़ेगी। पंजाब, जम्मू, राजस्थान और गुजरात में फेंसिंग लगने के बाद ही घुसपैठ और आतंकवाद पर लगाम लग पाई थी। हालांकि अपराधी बाड़ काटने की कोशिश करते हैं, लेकिन इसमें पकड़े जाने या मारे जाने का बहुत बड़ा खतरा होता है। यह बाड़ सिर्फ एक तार नहीं है, इसके साथ फ्लड लाइट, PTZ कैमरे, IR सेंसर और रडार जैसी तकनीकें भी इंटीग्रेटेड होती हैं।

अब यह काम तीन चीजों पर निर्भर करता है-

  • जमीन (Land): अब केंद्र सरकार के पास यह बहाना नहीं है कि राज्य जमीन नहीं दे रहा। यह उनके लिए एक बड़ी जिम्मेदारी है।
  • प्रक्रिया और फंड (Process & Fund): गृह मंत्रालय को टेंडरिंग करनी होगी। नदी वाले इलाकों में पिलर्स पर फेंसिंग लगाना काफी महंगा और मुश्किल काम है।
  • कूटनीति (Diplomacy): बांग्लादेश कई बार बाड़ को 'डिफेंस इंफ्रास्ट्रक्चर' मानकर विरोध करता है, हालांकि यह डिफेंस इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है। भारत को इसे कूटनीतिक तरीके से संभालना होगा।

पाकिस्तान बॉर्डर पर भी ड्रोन जैसी चुनौतियों से निपटने में समय लग रहा है। अब पूर्वी सीमा पर जब सरकार ने पहले ही दिन जमीन देने का वादा किया है, तो लोग बहुत करीब से देखेंगे कि यह काम कितनी जल्दी पूरा होता है, खासकर उन नॉन-फिजिबल गैप्स पर जहां बाड़ लगाना आसान नहीं है।

सवाल: जो घुसपैठिए पहले ही बॉर्डर पार कर देश के भीतरी हिस्सों तक पहुंच चुके हैं, उन्हें ट्रेस करना एक बहुत बड़ा टास्क है। इसके लिए बीएसएफ, लोकल पुलिस और खुफिया एजेंसियां किस तरह के Tech and Human Intelligence का प्रयोग करती हैं?

जवाब: नरेंद्र नाथ धर दुबे ने कहा कि बीएसएफ का अधिकार क्षेत्र सीमा के एंट्री पॉइंट तक ही सीमित है। अगर कोई घुसपैठिया सीमा पार कर देश के अंदर आ जाता है, तो एक निश्चित किलोमीटर के बाद बीएसएफ का जूरिडिक्शन खत्म हो जाता है। इसके बाद यह जिम्मेदारी राज्य पुलिस और अन्य एजेंसियों की हो जाती है।

अगर घुसपैठ के समय कैमरे, सेंसर या रडार से कोई सुराग या फुटेज मिलता है, तो बीएसएफ उसे खुफिया एजेंसियों के साथ शेयर करती है। जो घुसपैठिए अंदर आते हैं, वे बिना किसी लिंक के नहीं आते। उनके रिश्तेदार या ब्रोकर जो पहले से यहां रह रहे हैं, उनकी मदद करते हैं। वे उनका टिकट बुक कराते हैं और फर्जी दस्तावेज तैयार करवाते हैं। चूंकि उनका रूप-रंग और भाषा बंगालियों जैसी होती है, इसलिए उन्हें भीड़ में पहचानना मुश्किल है।

इन्हें पकड़ने के लिए बहुआयामी रणनीति की जरूरत है। इसमें रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, लोकल पुलिस और आम समाज की जिम्मेदारी है। हम अक्सर ज्यादा किराए के लालच में बिना पुलिस वेरिफिकेशन के इन्हें मकान दे देते हैं। ऐसा ही हमने संसद हमले या लखनऊ में ISIS एनकाउंटर के मामलों में देखा था, जहां आतंकी किराए के मकानों में छिपे थे। बैंक खाते खोलने वालों, सिम कार्ड देने वालों और मकान मालिकों, सभी को सतर्क होना पड़ेगा। पूरे समाज को एक साथ आना होगा, तभी इस समस्या का समाधान निकलेगा।

सवाल: सीमा सुरक्षा में सीमावर्ती गांवों के लोगों का क्या रोल होता है? बीएसएफ उन्हें भरोसे में लेने और अपने खुफिया नेटवर्क का हिस्सा बनाने के लिए क्या तरीके अपनाती है?

जवाब: BSF के पूर्व डीआईजी नरेंद्र नाथ धर दुबे ने कहा कि सीमावर्ती आबादी के मन में सुरक्षा की भावना पैदा करना बीएसएफ की ड्यूटी का प्राथमिक हिस्सा है। सीमांत इलाके कम विकसित होते हैं, वहां सड़कें, अस्पताल या स्कूल कम होते हैं। ऐसे में बीएसएफ ही दिन-रात उनकी साथी होती है।

बीएसएफ वहां काम कर रहे किसानों, मजदूरों, ट्रांसपोर्टरों और निर्माण एजेंसियों के साथ अच्छा तालमेल रखती है। लोकल पुलिस और जनता के बीच उनका अच्छा नेटवर्क होता है। हालांकि, यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि बंगाल बॉर्डर पर स्थानीय आबादी का एक हिस्सा अवैध गतिविधियों का संरक्षण करता है। यही स्थिति बांग्लादेश की तरफ भी है।

बॉर्डर पॉपुलेशन की यही समानता सबसे बड़ी विचित्रता है। इसलिए बीएसएफ का रोल बड़ा अजीब होता है, उन्हें स्थानीय लोगों के साथ मित्रवत भी रहना पड़ता है और उन पर शक भी करना पड़ता है। वहां मिनटों में परिस्थितियां बदल जाती हैं। बीएसएफ के जवान पिछले 60 साल से इस चुनौतीपूर्ण माहौल में ड्यूटी कर रहे हैं और वे इसके लिए पूरी तरह प्रशिक्षित हैं।

सवाल: बांग्लादेश सीमा पर घुसपैठ के अलावा ड्रग स्मगलिंग, मानव तस्करी, पशु तस्करी और जाली नोटों का भी खतरा है। इनमें सबसे बड़ा खतरा आप किसे मानते हैं? इससे निपटने के लिए बीएसएफ की स्ट्रैटेजी में किस तरह के बदलाव आए हैं?

जवाब: नरेंद्र नाथ धर दुबे ने कहा कि इन चारों के अलावा, मैं एक 5वां और सबसे बड़ा खतरा जोड़ना चाहूंगा- सिलीगुड़ी कॉरिडोर। सामरिक दृष्टि से यह बहुत महत्वपूर्ण है। वहां एक माइलस्टोन है जिस पर लिखा है: 'ढाका 525 किलोमीटर, गुवाहाटी 525 किलोमीटर, कलकत्ता 525 किलोमीटर।' इस जगह पर चीन और बांग्लादेश दोनों की नजर है। पिछले बांग्लादेशी रिजीम ने इसे लेकर कुछ आपत्तिजनक बातें भी कही थीं। भारतीय सुरक्षा तंत्र को इस कॉरिडोर को लेकर हमेशा चौकस रहना चाहिए।

बड़े खतरे-

  • मानव तस्करी (Human Trafficking): यह अवैध घुसपैठ से ही जुड़ा है और बहुत बड़ा क्राइम है। क्रिमिनल नेटवर्क इसका फायदा उठाते हैं। बीएसएफ घुसपैठ रोककर इसे नियंत्रित करने की कोशिश करती है और कोई सुराग मिलने पर पुलिस को सौंपती है।
  • नारकोटिक्स (Drugs): यह देश के लिए एक बड़ी चिंता है। बीएसएफ NDPS एक्ट के तहत कार्रवाई करती है। UAPA में बदलाव के बाद अब एनआईए NIA को भी नार्को-टेररिज्म की जांच का अधिकार मिला है। लेकिन हमें अपने तंत्र के भीतर के भ्रष्टाचार को भी देखना होगा, जैसे हाल ही में दिल्ली पुलिस के एंटी-नारकोटिक्स सेल के कर्मियों का करोड़ों का मालिक पाया जाना। इसके पूरे नेटवर्क को तोड़ना जरूरी है।
  • अवैध हथियार (Arms Smuggling): भारत में हाई-प्रोफाइल मर्डर जैसे शुभेंदु अधिकारी के पीए का ऑस्ट्रियन पिस्तौल से मर्डर हुआ। इससे पता चलता है कि विदेशी हथियारों का इस्तेमाल हो रहा है। ये हथियार अफगानिस्तान, पाकिस्तान, म्यांमार या समुद्री रास्ते से आते हैं। बीएसएफ और पुलिस जैसे- यूपी और दिल्ली एसटीएफ, इस पर लगातार कार्रवाई कर रही हैं।

आखिर में मैं यही कहूंगा कि इस सीमा की भौगोलिक स्थिति इतनी जटिल है कि जहां एक घर के चूल्हे का धुआं एक देश में और नाली का पानी दूसरे देश में गिरता है, वहां 100 प्रतिशत घुसपैठ या तस्करी रोक देने का दावा करना किसी के लिए भी मानवीय रूप से संभव नहीं है। लेकिन बीएसएफ इसे कम करने के लिए पूरी मुस्तैदी से काम कर रही है।

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